आयुर्वेद क्या है?

         आयुर्वेद प्राचीन भारतीय महर्षियों के अथक परिश्रम व अनुसंधान द्वारा विकसित की गई वह चिकत्सा पद्धति है जिसमें विभिन्न प्राकृतिक औषधियों व प्रक्रियाओं (पंचकर्म, उपकर्म, उपक्रम आदि) द्वारा शरीर के दोष, धातु एवं मलों को साम्यावस्था में रखते हए मनुष्य को सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान किया जाता है |

आयुर्वेद का सिद्धांत

         आयुर्वेद चिकत्सा “त्रिदोस-सिद्धांत” पर आधारित है | इसके अनुसार वात-वित्त-कफ ये तीनों ही दोष शरीर के निर्माण के आधार है | इन दोषों के अपनी साम्यावस्था से घट या बढ़ जाने पर ही शरीर व्याधिग्रस्त होता है | अत: विविध आयुर्वेद उपाय द्वारा इनकी समस्थिति बनाये रखना ही आयुर्वेद चिकत्सा का मूल सिद्धांत है |

प्रसंगिकता

आयुर्वेद चिकत्सा पद्धति शाश्वत व तथ्यपूर्ण है जिसे आज वैज्ञानिक प्रयोगों ने भी प्रमाणित किया है, साथ ही यह भी सिद्ध किया है कि आयुर्वेद शास्त्रों में लिखे सूत्र अक्षरश: सत्य हैं | यदि आयुर्वेदीय औषधियों व कर्मों का सही समय, सही मात्रा व शास्त्रोक्त प्रयोग किया जाए तो ये चमत्कारिक प्रभाव दिखाती है | उदा.- स्पोंडिसलाइटिस, थायराइडिजम, डायबिटीज, ऑस्टियो अर्थराईटिस (संधिवात), उच्च रक्तचाप, त्वचा रोग (दाद, सफ़ेद दाग, एक्जिमा, किलास आदि), रूहोमेटाइड अर्थराइटिस (आमवात), ऑस्टियोपोरोसिस (अस्थिक्षय), पक्षाघात व अन्य कई गंभीर व्याधियों का सम्पूर्ण उपचार आयुर्वेदीय औषधियों एवं पंचकर्म के माध्यम से सफलतापूर्वक किया जा सकता है |

         इन गंभीर व्याधियों के अतिरिक्त सामान्यतोर पर होने वाली बीमारियाँ जैसे- सर्दी-जुकाम, बुखार, खांसी, दस्त इत्यादि में सफल, सस्ता व सुरक्षित आयिर्वेदीय उपचार उपलब्ध है |

आयुर्वेद एक अद्वितीय चिकित्सा पद्धति है जो इतनी प्राचीन होते हुए भी आधुनिक समय व आधुनिक विज्ञान दोनों की कसोटी पर खरी उतरती है |

आयुर्वेद व पंचकर्म के बारे में भ्रांतियां

शहरों में स्पा व ब्यूटी सेंटर की तर्ज पर बनें पंचकर्म केन्द्रों ने इस (पंचकर्म) के विषय में लोगों को काफी भ्रमित किया है। आजकल लोग मालिश, मसाज या सिकाई को ही पंचकर्म समझने लगे हैं जो पंचकर्म का हिस्सा भी नहीं हैं।

         मालिश और सिकाई यानि स्नेहयुक्त अभ्यंग और स्वेदन पंचकर्म से पहले शरीर के दोषों / को ढीला करने वाले पूवकर्म मात्र हैं। यह पूर्ण उपचार हैं ही नहीं। यदि चिकित्सा के नाम पर इनका प्रयोग होता है तो ये हानिकारक भी हो सकता है क्योंकि अभ्यंग और स्वेदन (मालिश और सिकाई ) दोषों और मलों को अपने स्थान से ढीला कर विचलित तो कर देते हैं पर उन्हें शरीर से बाहर निकालने में सक्षम नहीं होते इसलिए कुछ देर के लिए शांत हुआ शारीरिक विकार समय आने पर पुनः प्रबल हो सकता है।

1. आयुर्वेद से संबंधित दूसरी मुख्य भ्रांति है कि इस चिकित्सा पद्धति में समय अधिक लगता है। यह भ्रांति भी पूर्णतः असत्य है। किसी भी व्याधि को शांत करने में जितना त्वरित प्रभाव अन्य चिकित्सा पद्धतियों को देखा जाता है उतना ही शीघ्र लाभ आयुर्वेद में भी है, फिर चाहे वह किसी प्रकार का दर्द हो अथवा व्रण (घाव)। किसी भी कुशल वैघ या चिकित्सक द्वारा मात्र दोश व रोग के निदान में जितना समय लगता है वही देरी का कारण होता है न कि उस चिकित्सा पद्धति की औषधियों का प्रभाव। उदाहरणार्थः 170 या इससे ऊपर के रक्तचाप में एक निरूह वस्ति इसे तुरन्त ही 10.15 पाइंट कम कर देती है और साथ में दी गई शमन औषधि (oral) व्यक्ति को त्वरित स्वास्थ्य लाभ देती है।

2. किसी भी घाव या व्रण में बीटाडीन या अन्य ड्रेसिंग एजेन्ट की अपेक्षा त्रिफला क्वाथ की ड्रेसिंग 80% तक अधिक अच्छे परिणाम प्रदर्शित करती है।

3. अद्य समाज में एक और भ्रांति यह है कि सभी आयुर्वेदिक औषधियों में गोमूल डाला / पड़ा होता है। यह भी पूर्णतः असत्य है। आयुर्वेदीय औषधियों का निर्धारण उनके गुणों (गुरू-लघु-उश्ण शीत आदि) व कर्मो (धातुवर्धक, पोषक, रेचक आदि) के आधार पर किया जाता है गोमूत्र के गुण व कर्म के आधार पर ही किसी औषधि में उसकी आवश्यकता है या नहीं यह विचार कर उस औशधि में उसकी संकल्पना की जाती है।
         गौमूत्र का औषधि में प्रयोग, किसी भी राग, दोषस्थिति, रोगी की प्रकृति इन सभी का ध्यान रख कर किया जाता है। गोमूत्र का अधिक प्रयोग या सभी औषधियों में इसका प्रयोग हानिकारक होता है। जिन व्याधियो में उपचारार्थ गोमूत्र के समान गुण व कर्मो की आवश्यकता होती है मात्र उन्हीं औषधियों में गोमूत्र की भावना दी जाती है सभी में नहीं। गोमूत्र-युक्त औषधियों की पहचान उनकी तीक्ष्ण गंध से ही हो जाती है जो कि सभी या लगभग 98% आयुर्वेदीय औषधियों से नहीं आती जो इस बात का परिचायक है कि उनमें (अधिकतर 98% औषधियें ) गोमूत्र नहीं मिला है।
         संभवतः इस भ्रांति का उदय किसी समुदाय विशेष को आयुर्वेद से वंचित रखने के लिए अथवा आयुर्वेद के हनन / ह्रास के उद्देश्य से किया गया होगा।

4. आयुर्वेद संबंधी एक भ्रांति यह है कि भस्मों के सेवन से किडनी खराब होने का भय होता है। यह भी उतनी ही मिथ्या बात है जितना कि किसी शंकित व्यक्ति द्वारा रस्सी को सांप समझना। आयुर्वेदीय विधियों से निर्मित भसमों की 12 से भी अधिक सूक्ष्म परीक्षाएं होती हैं यथा-वारितर, निर्धूम, रेखापूर्ण आदि। इसके अतिरिक्त आजकल इन सभी भस्मों को लेबोरेट्री (प्रयोगषाला) में माइक्रोप्रोसेसिंग, फ्लोरोसेन्ट टेस्ट, क्रोमेटिक डिस्टीलेशन जैसी कई कसौटियों को पार करने के बाद दवा बाजार या आभ्यांतरिक प्रयोग हेतु स्वीकृति प्राप्त होती है। अतः इन भस्मों व औषधियों का वैद्यकीय मार्गदर्शन में निर्भीक प्रयोग किया जा सकता है।